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मंगलवार, 29 जून 2010

सफ़र मा पिया..

खुल गय गठरिया ॥

सफ़र मा पिया॥

मोच खय गय करिहैया ॥

रगड़ मा पिया॥॥

बगल वाली सीट पे रहेली अकेली॥

साथ नइखे रहली हमरे संग के सहेली॥

रात दुई लैका जलाय देखले दिया॥

मोच खय गय करिहैया ॥
रगड़ मा पिया॥॥

पहले तो मैंने अकड़ करके बोली॥

उनके मुहवा से छुटेला ठिठोली॥

गर्मी शरिरिया से निकला धुँआ॥

मोच खय गय करिहैया ॥
रगड़ मा पिया॥॥

धीरे धीरे नीक लाग ॥ अचरज भा मनवा॥

हौले हौले खोले लागे हमरा अचरवा॥

बोले होय्जा राज़ी खिलौबय पुआ॥

मोच खय गय करिहैया ॥
रगड़ मा पिया॥॥

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